Tuesday, January 14, 2020

AAGE BADH TU,,,,

Motivational Hindi poems

आगे बढ़ तूँ ,,,,


तिनका ,तिनका जोड़कर ,
करे निर्मित नव नीड़ ,
तार तार बिखरे हों चाहे ,
जाने किस विधि जोड़कर !
तूँ भर दे  ' मधुर ' संगीत ,
फिर भी , जाने क्यों ये संसार ,
तुझे अबला ही पुकारे ,,
चल रहा जबकि , तेरे ही सहारे !
लग गए तेरी मुस्कुराहटों पर भी 
विराम चिन्ह !
पौंछ आँसुओं  के ढ़र्रे ,
बह रहे हैं ,जो कोरों से तेरे ,
तोड़ निर्बल का घरौंदा ,
हृदय मैं अन्तर्निहित शक्ति की ,
सुन आर्त पुकार ,
छोड़ अपना चीखों से भरा विलाप तूँ ,,
त्रस्त नहीं तारणहार बन ,
आँसुओं को पीछे छोड़ ,
आगे बढ़ तूँ  , आगे बढ़ तूँ ,,,,,,,,



Friday, January 10, 2020

AETICALE - TU SIRF TU HAI , KABHI KHUD SE BHI PYAAR KAR ,,,,

आर्टिकल 

तूँ सिर्फ तूँ है , कभी खुद से भी प्यार कर ,,,,


तूँ सिर्फ तूँ है , कभी खुद से भी प्यार कर , कभी खुद को भी जान ले ,

छोड़ दे जीना दिखावटी , है जो ये झूठी मुस्कान , तेरे होंठों पर ,
तिलमिलाहट तेरे मन की , बिखर रही , बनके मुस्कराहट होंठों पर ,
कितना भी चोटिल हृदय तेरा ,तनिक भी शिकन न चेहरे पर तेरे ,
छोड़ दे जीना , दिखावटी  ! 
Image result for women paintings indianआज कल तो तेरी स्थिति  और भी दयनीय है ,
कहाँ चूड़ी , बिंदी , कंगन , श्रृंगार तेरा , 
और आज तमाम उपालम्भ , उपहास , तुलना  , वेदना , से  सुसज्जित ,
सुअलंकृत  है तूँ ,,,,, तेरी भी तो कुछ ख्वाहिशें थी ,, जिनको तूने अपने हृदय मैं ,
संजोया था , वो कही छिन्न - भिन्न  कालकवलित हो गईं  !
रौंद  दी गईं  , भावनाएँ तेरी , लहूलुहान सा तेरा मन ,,, फिर भी ताज़ी है तेरी मुस्कान ,
आँखें भले ही हों नम ! 
बड़ी ही चतुराई से छिपा लेती है तूँ , उन कीमती मोतियों को अपने आँखों की सीपी में !
या यूँ कहूँ , की अपनी आँखों की नाजुक पलकों के भीतर ही सूखा देती है , उन नमकीन सी ,
बूंदों को  ,,, वैसे उनके लिए यही वेहतर है , क्योंकि न ही उनका कोई कदरदान है यहाँ ,
वे तो  बस  वे मोल है ,,,मगर इतनी सादगी भी अच्छी नहीं ,,, तेरी सादगी से ,,अथाह सागर से गहरे ,,,
तेरे हृदय की गहराई ,, को भी मापा जा सकता है ,, बस उसके लिए आँखों की जरुरत है ,,,
तेरी आवाज की नमी , भी तेरे हृदय की शीतलता की परिचायक है ,,,
ये सादगी , ये शीतलता  ही तो वह  वजह है ,,,
जिससे झुँझला उठता है हृदय तेरा ,,, सीख कुछ इस झुंझलाहट ,, इस तिलमिलाहट से ,,
खुद को एक चट्टान की तरह बुलंद कर ,,, के आग , पानी , हवा बैहर , न कर पाए तेरा बाल भी बाँका ,
रूंध ले एक कवच सा ,, इर्द - गिर्द अपने , ,,कोई काँटे  कटीले  चुभ न पाएं तेरे मन को ,,
कोई कटाक्ष , कोई तीक्ष्ण शब्दों के बाण ,, भेद न पाएं  , तेरे हृदय को ,,,
अपने आप मैं ही ,, तूँ  इतनी शसक्त है ,, चट्टान की तरह अड़िग है ,,
ऐसा अस्तित्वहीन , जिंदालास  , मृतकों की तरह जीना भी क्या जीना ??
तूँ  सिर्फ खुद से प्यार कर , छोड़ दे जीना दिखावटी ,,,,
कहीं ओझल सा हो गया ,, तेरा आत्मविश्वास ,,
और दूसरों की उपेक्षा एवं अपेक्षाओं का वसेरा  हो गया है तुझ पर ,,,
तूँ  अपने जीवन मैं ,, नया सवेरा ला ,,,,,,,,,,,,,



ANTARMAN


अन्तर्मन 

डूब गई  , मैं खुद ही , खुद मैं !
कैसे शांत करूँ ?
इस बिचलित बिहंग को !
तड़प उठी , अचला सी मेघों को !
मचल मचल , लहराती  ,
शनैः शनैः जलती दीपक की लौ सी !
जलती रही मैं भी


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डूब गई , मैं खुद ही ,खुद मैं,
खोज रही थी ,
मन की वीणा के तार ,
अपने अंतस मैं बार बार ,
खोज रही थी ,
' मधुर ' श्वर  संगीत ,
अनुराग राग , उन्माद भरा ,
विहँस - विहँस  बिकलित अंतर्मन ,
छिन्न- भिन्न चितवन , मुर्झा गई कलियाँ ,
सूख गए , सब वन - पराग ,
डूब गई , मैं खुद ही , खुद मैं !
अंतर्मन की इस झंझाबात ने ,
घेर लिया दिग्भ्रान्त ,
नीर भरा , नीरस सा मन ,
सागर सी गहराई ,
कैसे पहुँचु तट तीर ,
खोज रही थी ,
हिय मैं अपने ,अपनी आभा को ,
विधु समान कान्ति हो जिसमें ,
पुनीत पावन सा मर्म ,
खंगाल रही थी ,
सागर मैं मोती ,
डूब गई , मैं खुद ही , खुद मैं ! 



    ANTARMAN


Wednesday, January 8, 2020

virah vedna



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विरह वेदना ,,,,,


कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन  की पिपासा ,,,,
कितने अश्रु  दृगों मैं ,
पलकें बिछाएँ करते इंतजार ,
हृदय घिरा घनघौर तिमिरमय ,
तिमिरमय मेरा संसार तुम बिन ,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन  की पिपासा ,,,,,

भर जाता हृदय मैं उन्माद सा ,
घुल जाता होंठों मैं बिषाद सा ,
कितनी विरह ,   कितनी वेदना,
  कितनी मिलन की पिपासा  ,,,,,

आंखें पथरीली हो गईं ,
पलकें हुई निर्झरिणी ,
पीड़ा कुछ कम  न हुई ,
हृदय चितवन बिच्छिन्न हुआ ,
कलियाँ सारी मुर्झा गईं ,
छा जाता हृदय मैं विराग सा ,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,

नींद से सूनी पलकें ,
तेरी यादों की परछायीं ,
चिर उन्नींदी  मेरी निशाँ ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

विरह की यह वेदना ,
विरह का क्रंदन मेरा ,
एक करुण  भाव से ,
गूंजता उर मैं न जाने ,
मधुर स्वर अलापता ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

क्रंदन से आहत हृदय हुआ ,
तनिक भी आराम न ,
नीर भरा ,एक आह भरा ,
प्रतिपल, प्रतिक्षण मेरा  ,
अनुराग भी उन्माद सा ,
संगीत की लयमय अनुभूति ,
उन्माद भरी बेस्वाद सी ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,,

पलकों पर हैं पल रहे ,
स्वप्न प्रियतम से मिलन के ,
नैन थक थक चूर हुए ,
तेरा पथ निहार कर ,
चिर उन्माद उर  मैं समाया ,
कट गया  घनघोर तिमिर ,
आस जागी फिर मिलन की ,
प्यासी थी पपीहे की तरह ,
स्वाति की एक बूँद को ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

नैन मगन हो गए ,
झर झर  बरसने लगे ,
दृगों से मोती !
पलकें सजी हैं व्रीड़ा के गहनों से ,
होंठों ने मुस्कुरा कर कहा ,
मेरा सर्वस्वा तो तुम ही हो ,बस तुम ही हो ,,,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,,,


 VIRAH VEDNA



Friday, October 25, 2019

urza aur ershaya ,,,,

एक अच्छी ऊर्जा और इर्ष्या ,,,,,

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जब कोई ऊर्जा किसी ईर्ष्या से ,
बात करती है , तो कहती है की ,
उगते हुए सूरज के प्रकाश की ,
किरणों के प्रकीर्णन , को रोक पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,,,
थम भी जाएँ बारिशें ,घनघौर तो क्या ,
प्रचंड हवाओं की लहरों को क्षेण पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,
और जब इश्क़ हो मुसाफिर  को ,
मंज़िल से अपनी ,और पाना हो उसको ,
दिल मैं बारूद सा भरकर ,
निकला है मुसाफिर ,
इरादों मैं दहकते शोलों को ,
ठंडा कर पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,
कितनी भी अड़चनें डालेगा ,
मेरी राह मैं ,
मैं तो हूँ ,आवारा पंक्षी ,
उड़ जाऊँगा , इन बादलों से भी ऊपर ,
इन घनघौर हवाओं को भी ,
काट सकता हूँ ,
मेरा रास्ता मोड़ पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,,



              EK ACHI URZA AUR ERSHYA

Tuesday, October 22, 2019

KAHANI NAARI KI ,,,,

कहानी नारी की ,,,,



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कहानी नारी की ,,
नारी के जीवन मैं रंग अनेक हैं ,
हर रंग से बनती एक खूबसूरत तस्वीर है ,,,,
मगर हर तस्वीर की एक अलग ही कहानी है ,
कहानी उसकी नादानी की ,
रोष , आक्रोश , या कभी उदासी मैं डूबी 
जवानी की ,,,
कहानी अम्बर को छूने की ,,
ललक आकाश मैं उड़ने की ,
तृष्णा अपने अस्तित्व को पाने की ,
जीवन मैं अपनी एक अलग ,
पहचान बनाने की ,,
कहानी अपने लिए लड़ने की ,
कहानी दूसरों के लिए  , अपने 
जीवन को न्यौछावर कर देने की ,
कहानी सबको अमृत देने की ,
और खुद घूँट घूँट विष के ,
प्याले पीने की ,,
कहानी पुरुषों के पैरों , रौंदे  जाने की ,
या अत्याचार के विरुद्ध , अपनी आवाज़ उठाने की ,
कहानी नारी के अस्तित्व को मिटाने की ,
या देवी रूप मैं पूजे जाने की ,,
सतयुग ,त्रेता ,द्वापर , कलयुग 
युगों - युगों से चली आ रही ,
कहानी नारी की , 
अपना आत्मसम्मान खोकर ,
हर बार परीक्षा देती आई  है,
सीता हो या पांचाली ,,,
कहानी नारी की ,, मगर 
अब इतिहास बदलेगा ,
और बदलेगी हर कहानी ,
अब और भी खूबसूरत होगी ,
उसकी तस्वीर निखरेगा हर रंग ,
सम्मान और स्वतंत्रता से ,
परिपूर्ण होगी अब ,
कहानी नारी की ,,,,,





Friday, October 18, 2019

JINKO PAHUNCHNA HOTA HAI ,,,,,

जिनको पहुँचना होता है ,,,,,,,,



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     जिनको पहुँचना होता है ,
     प्रकृति भी उन्हें ,रास्ता दिखाती है ,
     जिनको उड़ना होता है ,
    आसमां भी उनको गले से लगाता  है ,
    कैसे रोक सकते हो ,
   इन पंक्षियों को उड़ान से ,
   जबकि आसमां भी उनका है ,
   और रास्ता भी उनका है ,,,,,,


kal phir wahi raat thi ,,,

कल फिर वही रात थी ,,,, कल फिर वही रात थी , वारिश तेज हो रही थी , नई नई मुलाक़ात थी , कल  रात थी , तुम मिले...