Sunday, February 23, 2020

kal phir wahi raat thi ,,,


कल फिर वही रात थी ,,,,




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कल फिर वही रात थी ,
वारिश तेज हो रही थी ,
नई नई मुलाक़ात थी ,
कल  रात थी ,
तुम मिले , मैं मिली ,
एक खूबसूरत सी ,
बात थी ,
कल फिर वही रात थी ,
आसमान में ,काली घटा ,
बादलों की ,
रात काली ,
हर तरफ बस धुआँ  धुआँ ,
हर तरफ बस धुआँ  धुआँ ,
तारे भी , टिम टीमा रहे थे ,
चाँद भी , मुस्कुरा रहा था ,
तरन्नुम -ए - फिज़ा भी ,
महक उठी थी ,
तबस्सुम , चाँदनी  की ,
अदायगी , चाँदनी की ,
आँखें मींच कर ,
चाँदनी को , खींच कर ,
चाँद भी ,अपनी मस्ती में था ,
कल फिर वही रात थी ,
बारिश तेज हो रही थी ,
नई  नई  मुलाक़ात  थी ,,,,,

ishq ki ibaadat chahti hu ,,,,,

ishq ki ibaadat chahti hu,,,

इश्क़ की ईबादत चाहती हूँ ,,,

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इज़हार -ए - इश्क़ ,
यूँ न कर तू ,
मुझे तिज़ारत नहीं ,
तेरा मुकम्मल जहाँ चाहिए ,
मुझे , तूँ  चाहिए ,
मुझे , तेरा इश्क़ चाहिए ,
तेरी बाहों का , खूबसूरत हार चाहिए ,
न आरज़ू है , महलों की ,
न ज़माने की शांनो - शौकत से है ,
रिश्ता कोई ,
अपनी पलकों में छिपा ले , मुझको ,
हर दर्द से बचा ले , मुझको ,
में ज़माने से तुझ पर गुरूर करूँ ,
मेरी नज़रों में , तेरा वह मुकाम चाहिए ,
में गुलाम नहीं , तेरे क़दमों की ,
मुझे तो, तेरे दिल का , सरताज चाहिए ,
मुझे ,  तूँ , चाहिए ,
मुझे , तेरा इश्क़ चाहिए ,
तूँ चले , में चलूँगी ,
तेरे साथ , बनके हम रही ,
बस तुझे , रुकना पड़ेगा ,
मेरी आवाज़  , सुनके ,
मेरा इश्क़ है , जो ,
सुर्ख लाल  , रंग का ,
तेरे इश्क़ में भी ,
वह बात चाहिए ,
मुझे , तूँ चाहिए ,
मुझे , तेरा इश्क़ चाहिए ,
तेरी , आँखों में अपना , चेहरा ,
और ,
बेशुमार , प्यार चाहिए ,
मेरी आँखों , में जो नमीं है ,
वह तूँ है,
तेरे होंठों पर भी , सिर्फ ,
मेरा  , नाम चाहिए ,
मुझे, तूँ  चाहिए ,
मुझे,  तेरा इश्क़ चाहिए ,
बस और कोई इल्तज़ा नहीं ,
तेरे इश्क़ में , भी ,
ईबादत  चाहती हूँ 
सदा ही तेरी क़ुरबत चाहती हूँ ,
तेरे साये में जीना ,
तेरे साये में, मरना चाहती हूँ ,
अल्फ़ाज़ ही नहीं अब की ,
और क्या चाहिए ,
मुझे तूँ चाहिए ,
मुझे तेरा इश्क़ चाहिए ,,


Sunday, February 9, 2020

ek adna si ladki ,,,,

एक अदना सी लड़की 


एक अदना सी लड़की , जिसकी सोच बड़ी विशाल , समंदर की तरह शान्त  , अपार , वह स्वयं  ही एक कल्पना की तरह !
जिसका वास्तविक दुनियाँ  से कोई ताल्लुक़ ही न था | वो रहती तो कहीं भीड़ में , मगर उसके मन का हंसा , कहीं और ही विचरण करता ! जाने किस चीज की तलाश में भटक रही थी |

बचपन से ही अपने व्यक्तित्व को सजा रही थी , सँवार  रही थी | शारीरिक रूप से परिपक्व न थी , मगर मानसिक  रूप से बहुत परिपक्व थी , उसके विचारों में विशालता थी |

वो इतनी काल्पनिक की सोचती की , जो में सोचती हूँ , मेरे साथ वही होगा , कल्पनाओं में जीती , और कहती अच्छा अच्छा सोचो , सोचने में क्या बुरा है , सोचेंगे तभी तो होगा |

जमीन पर तो , वह कभी रहती ही न थी , उमंगें इतनी की हर वक़्त उड़ती ही रहती , मगर सिर्फ अपनी सोच और अपनी कल्पनाओं में ! कभी कहती की धरती से आकाश तक का सफर तय करेगी ! आज कल खुद से भी प्यार करने लगी थी , थोड़ा वक़्त निकाला था खुद क लिए भी , और जब खुद से प्यार किया तो पता चला , में भी ख़ूबसूरत हूँ ! अब तो उसकी बातों का ठिकाना ही न था , कहने लगी , मुझसे खूबसूरत तो ,कोई है ही नहीं , जानती ही न थी की वह भी खूबसूरत है , शायद इसलिए!

इतनी काल्पनिक थी की , जीवन  में उसके कल्पना के अलावा , वास्तविकता का नामोंनिशान  भी न था | भीड़ में भी  , सबसे परे
प्रत्यक्ष है , मगर फिर भी , न थी ,  बस अपनी ही दुनियाँ में अकेले चलती रही ! जाने की चीज की तलाश में |

एक अलग ही अपने कल्पनाओं की दुनियां  सजाई थी ! उस अदना सी लड़की ने , जिसमे अकेले ही अपने मनमतंग घूमती रहती थी |
वह अदना सी लड़की , अपनी इस काल्पनिक दुनिया को किसी भी सूरत में , वास्तविक बना लेना चाहती थी जिसके लिए वह खुद ही गुमनाम सी हो गई ,कहीं ,  अपनी ही तलाश में !
वो खुद तो बहुत साधारण , मगर उस अदना सी लड़की कि सोच वेहद असाधारण !
 वह सोचती की ,
अपने व्यक्तित्व को इतना सजाओ , इतना सँवारो  , की चमक उठे , चेहरे में चमक झूठ , पहनावा में चमक छलमात्र ! जब आपके व्यक्तित्व की चमक अपनी छटा बिखेरेगी तो , चेहरा और पहनावा स्वतः ही चमक उठेगा |

वह अदना सी लड़की, अपने व्यक्तित्व को किसी खूबसूरत चित्र की तरह गढ़ती रही , भिन्न - भिन्न प्रकार के रंगों से | उसकी सोच में इतना लचीलापन  था ! हर वक़्त , है डगर पर परिस्थति के हिसाब से चलती रही , मगर चलती रही | वेसक वह मौन थी , उसकी आवाज में कोई शोर न था , मगर अप्रत्यक्ष रूप से , फिर भी , बहुत तेज शोर था !
चल रही थी धीरे धीरे अपनी ही धुन में , मग्न  अकेले !
वह सोचती  की  , जिंदगी के इस सफर में रुक जाने का मतलब है , अपनी अवनति को गले लगाना , और स्वयं ही अपना पतन सुनिश्चित कर देना |
और यूँ ही , अपने विचारों और अपने व्यक्तित्व को रोज रोज सींच कर , हरा भरा करती , सजती रही , निःशब्द , मौन , यूँ ही चलती रही , वक़्त की हर चोट के साथ कदम मिलाकर |
और किसी जुलाहे की तरह करघे पर , अपनी कल्पनाओं के सुन्दर,सुन्दर  , रंग बिरंगे , धागे जोड़कर , बुनती रही सुन्दर सूत अपने ख़्वाबों का !
 थान  अपने ख़्वाबों का बन लिया था , इतना लम्बा  , की अर्ज़ नहीं मिल रहा था कहीं ! और भटकती रही उसकी तलाश में !
एक अदना सी लड़की | 

Friday, February 7, 2020

Meghon ki chaah mein ,,,

मेघों की चाह में

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बैचेन धरती आह भर रही है  ,
मेघों की चाह  में ,,,
चल रही बयार है ,
शरीर सूख गया ,
और चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगीं ,,,
बस धरती तड़प रही है ,
मेघोंकी चाह में ,,,
हर जीव साँस ले रहा है ,
इस नश्वर मृत्तिका की बाँह  मैं ,,,
तड़प इस अचला की ,
समझे भी कौन ?
एक आस है मेघों से ,
और समझेगा कौन !
बिचलित हैं बिहंग ,
वृक्षों ने भी , खड़े कर  लिए हाँथ ,
वरखा भी मनमतंग  है ,
अपने ही राग में ,
बस धरती तड़प रही है,
मेघों की चाह में ,,
कृषकों ने भी छोड़ दिया ,
दमन गाँवों का ,,
जोड़ लिया नाता शहरों की ,
गलियों से ,,
सूख गए सब खेत-खलिहान ,
मेघों की चाह में ,,,
जिधर देखो , बड़ी बड़ी ,
इमारतें पनप रही हैं ,
धरती की गोद  में ,
आँचल में , उसके ,
पड़  गईं  , दरारें अनेक ,
धरती बस मौन है ,
मेघों की चाह में ,,,,,



Sunday, January 26, 2020

surkh syaahi


सुर्ख स्याही 



बड़ी ही बेबाकी से आह  भर रही है ,
किताब के पन्नों की सुर्ख स्याही ,
इतने बरस बीत गए , मगर आज भी वह महक ,
बरक़रार है ,वह खुशबू  , तेरे ज़िक्र  की। 

 ' हमनें तो तुम्हें , जमाने की बंदिशों को ,
लांघकर  स्वीकारा , और तुम एक लफ्ज भी हमे ,
अपना न कह सके '

हमेशा अपनी शर्तों पर जीती रही ,
मगर तुझसे कोई शर्त न रखी। 

ज़िन्दगी एक ढलती शाम बनकर रह गई। 
' अमृता  ' कहती है  '' ये अजनबी तुम मुझे जिंदगी ,
की शाम मैं क्यों मिले , मिलना है तो दोपहर मैं मिलते ''

कभी हम किसी के कैनवास पर उसकी , कल्पना ,
बनकर उकेरे गए ,,,,
कभी सुर्ख स्याही  सी मैं ,,,
कभी उसके कैनवास पर एक रहस्यमयी  लकीर  ,
बनकर रह गई  ,, खामोश सी ,,
और उसे एक टक  देखती रही ,,,
खामोश एक टक  देखते रहना ,
तुम्हें क्या लगता है , कोई सजा है !
यूँ ही निःशब्द तुम्हारे करीब ,
बैठे रहना ही शायद ,
हर मर्ज़ की दवा है ,,,,

आंसुओं से तर , सनी हुई  , मेरी हर शाम ,
गुमशुदाई  की चादर सी तन गई है , मुझ पर ,,
ग़ुम  हो जाना चाहती हूँ  , इस चादर मैं ही लिपटकर ,
सफर मैं अकेले इस तरह , चलने की अब चाह नहीं ,,,,

बेख्याली के लिए  , इतना मशहूर हो गए है ,
हम भी गए ,,,
बस मौन है , कागज कलम ,, और सुर्ख स्याही ,,,,,



Thursday, January 23, 2020

mere canvas ke kuchhek rang ,,' main aur meri dadi '

अविस्मरणीय पल ,,,



मेरे कैनवास के कुछेक रंग  '' मैं और मेरी दादी ' 


हमारी तस्वीर तो बहुत रंगीन है , कुछेक रंगों का एहसास बता रही हूँ।  मेरी कैनवास के कुछेक रंग ' मैं और मेरी दादी' कुछेक रंग

कहूँ या हर रंग इनसे ही रचा बसा है , एक अलग ही कहानी है हमारी , दादी की आँख का तारा हूँ मैं , और दादी भी मेरी आँखों

का तारा हैं।यहीं कोई पैंसठ बरस की हैं मेरी दादी , ऊँची कद -काठी , गोरी चिट्टी , तन्दरुस्त  ,बस बाल पूरे  सफेद हैं  'अंग्रेजन '

जैसे।   बहुत लम्बा वक़्त हो गया है उनसे मिले हुए , मगर यूँ लगता है  , मानो यही कहीं हैं , मगर सिर्फ दिल की तसल्ली।

आज कल तो बड़ी कबायद हो गई  है आने जाने की , इतने दूर जो आ गए हूँ ,,, बहरहाल विडियो कॉल  पर बात हो


जाती है। देख लेते हैं एक दूसरे को कभी - कभार।  अरसे  बीत गए हों , उस बात को ,लगता है।, जैसे , जब  दादी के साथ ही

सोना होता था , दादी के साथ ही खाना होता था , दादी कहीं जाने को तैयार  क्या  हुईं  , हमें भी जाना होता था। 

मैं अक्सर जिद करके , ननिहाल दादी की माँ  के यहाँ जाया करती थी बल्कि वह हर जगह जहाँ भी वह जाती थीं।  कई बार तो

ऐसा होता था दादी भी मेरे साथ ही मिल जाती थी , और मुझे ,, जब भी उनको कहीं जाना होता था तब ,, घर के बाकि छोटे

बच्चे परेशान न करें ,, उनको पता न चले की मैं भी दादी के साथ जा रही हूँ ,, मुझे पहले ही रस्ते मे आगे मोड़ पर भेज देती थीं

और वहां से फिर हम चले जाते थे घूमने।अब तो यह शरारत भी नहीं होती।  दादी मेरी समंदर मैं किसी जादुई नाव  की तरह हैं ,

जो तेज तूफान बबंडर से भी चुटकियों मैं निकाल देतीं या यूँ कहूँ  कोई अलादीन का चिराग की तरह हैं , जो , मैं जो माँगू , वह


किसी भी तरह उपलब्ध करने की कबायद मैं लग जाये , और मैं भी कोई काम थोड़ी न थी , दादी को भी अलादीन के चिराग की ही तरह घिसती थी।  
   
 यूँ ही अनायास सोचने लगी थी और पूर्व स्मृतियाँ आँखों मैं झूलने लगीं , और मैं स्नेहसिक्त हो आत्मविस्मृत हो गई। 

Tuesday, January 14, 2020

nayi nayi dosti kalam se meri ,,,,

नयी नयी दोस्ती कलम से मेरी ,,,,




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मैं ज़िंदगी का हर फ़लसफ़ा ,
तुझसे ही इख़्तियार करूँ ,
मेरी ' कलम ' तुझसे बेहतर ,
कोई और मेरा ज़ानिब नहीं ,,,,

मैं भी तन्हा, मेरा हर ख़याल भी तन्हा ,
तो सोचा, क्यों न साथ चलें ,
दिल की तसल्ली के लिए ,
ये ख़याल अच्छा है ,,,,,,



AAGE BADH TU,,,,

Motivational Hindi poems

आगे बढ़ तूँ ,,,,


तिनका ,तिनका जोड़कर ,
करे निर्मित नव नीड़ ,
तार तार बिखरे हों चाहे ,
जाने किस विधि जोड़कर !
तूँ भर दे  ' मधुर ' संगीत ,
फिर भी , जाने क्यों ये संसार ,
तुझे अबला ही पुकारे ,,
चल रहा जबकि , तेरे ही सहारे !
लग गए तेरी मुस्कुराहटों पर भी 
विराम चिन्ह !
पौंछ आँसुओं  के ढ़र्रे ,
बह रहे हैं ,जो कोरों से तेरे ,
तोड़ निर्बल का घरौंदा ,
हृदय मैं अन्तर्निहित शक्ति की ,
सुन आर्त पुकार ,
छोड़ अपना चीखों से भरा विलाप तूँ ,,
त्रस्त नहीं तारणहार बन ,
आँसुओं को पीछे छोड़ ,
आगे बढ़ तूँ  , आगे बढ़ तूँ ,,,,,,,,



Friday, January 10, 2020

AETICALE - TU SIRF TU HAI , KABHI KHUD SE BHI PYAAR KAR ,,,,

आर्टिकल 

तूँ सिर्फ तूँ है , कभी खुद से भी प्यार कर ,,,,


तूँ सिर्फ तूँ है , कभी खुद से भी प्यार कर , कभी खुद को भी जान ले ,

छोड़ दे जीना दिखावटी , है जो ये झूठी मुस्कान , तेरे होंठों पर ,
तिलमिलाहट तेरे मन की , बिखर रही , बनके मुस्कराहट होंठों पर ,
कितना भी चोटिल हृदय तेरा ,तनिक भी शिकन न चेहरे पर तेरे ,
छोड़ दे जीना , दिखावटी  ! 
Image result for women paintings indianआज कल तो तेरी स्थिति  और भी दयनीय है ,
कहाँ चूड़ी , बिंदी , कंगन , श्रृंगार तेरा , 
और आज तमाम उपालम्भ , उपहास , तुलना  , वेदना , से  सुसज्जित ,
सुअलंकृत  है तूँ ,,,,, तेरी भी तो कुछ ख्वाहिशें थी ,, जिनको तूने अपने हृदय मैं ,
संजोया था , वो कही छिन्न - भिन्न  कालकवलित हो गईं  !
रौंद  दी गईं  , भावनाएँ तेरी , लहूलुहान सा तेरा मन ,,, फिर भी ताज़ी है तेरी मुस्कान ,
आँखें भले ही हों नम ! 
बड़ी ही चतुराई से छिपा लेती है तूँ , उन कीमती मोतियों को अपने आँखों की सीपी में !
या यूँ कहूँ , की अपनी आँखों की नाजुक पलकों के भीतर ही सूखा देती है , उन नमकीन सी ,
बूंदों को  ,,, वैसे उनके लिए यही वेहतर है , क्योंकि न ही उनका कोई कदरदान है यहाँ ,
वे तो  बस  वे मोल है ,,,मगर इतनी सादगी भी अच्छी नहीं ,,, तेरी सादगी से ,,अथाह सागर से गहरे ,,,
तेरे हृदय की गहराई ,, को भी मापा जा सकता है ,, बस उसके लिए आँखों की जरुरत है ,,,
तेरी आवाज की नमी , भी तेरे हृदय की शीतलता की परिचायक है ,,,
ये सादगी , ये शीतलता  ही तो वह  वजह है ,,,
जिससे झुँझला उठता है हृदय तेरा ,,, सीख कुछ इस झुंझलाहट ,, इस तिलमिलाहट से ,,
खुद को एक चट्टान की तरह बुलंद कर ,,, के आग , पानी , हवा बैहर , न कर पाए तेरा बाल भी बाँका ,
रूंध ले एक कवच सा ,, इर्द - गिर्द अपने , ,,कोई काँटे  कटीले  चुभ न पाएं तेरे मन को ,,
कोई कटाक्ष , कोई तीक्ष्ण शब्दों के बाण ,, भेद न पाएं  , तेरे हृदय को ,,,
अपने आप मैं ही ,, तूँ  इतनी शसक्त है ,, चट्टान की तरह अड़िग है ,,
ऐसा अस्तित्वहीन , जिंदालास  , मृतकों की तरह जीना भी क्या जीना ??
तूँ  सिर्फ खुद से प्यार कर , छोड़ दे जीना दिखावटी ,,,,
कहीं ओझल सा हो गया ,, तेरा आत्मविश्वास ,,
और दूसरों की उपेक्षा एवं अपेक्षाओं का वसेरा  हो गया है तुझ पर ,,,
तूँ  अपने जीवन मैं ,, नया सवेरा ला ,,,,,,,,,,,,,



ANTARMAN


अन्तर्मन 

डूब गई  , मैं खुद ही , खुद मैं !
कैसे शांत करूँ ?
इस बिचलित बिहंग को !
तड़प उठी , अचला सी मेघों को !
मचल मचल , लहराती  ,
शनैः शनैः जलती दीपक की लौ सी !
जलती रही मैं भी


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डूब गई , मैं खुद ही ,खुद मैं,
खोज रही थी ,
मन की वीणा के तार ,
अपने अंतस मैं बार बार ,
खोज रही थी ,
' मधुर ' श्वर  संगीत ,
अनुराग राग , उन्माद भरा ,
विहँस - विहँस  बिकलित अंतर्मन ,
छिन्न- भिन्न चितवन , मुर्झा गई कलियाँ ,
सूख गए , सब वन - पराग ,
डूब गई , मैं खुद ही , खुद मैं !
अंतर्मन की इस झंझाबात ने ,
घेर लिया दिग्भ्रान्त ,
नीर भरा , नीरस सा मन ,
सागर सी गहराई ,
कैसे पहुँचु तट तीर ,
खोज रही थी ,
हिय मैं अपने ,अपनी आभा को ,
विधु समान कान्ति हो जिसमें ,
पुनीत पावन सा मर्म ,
खंगाल रही थी ,
सागर मैं मोती ,
डूब गई , मैं खुद ही , खुद मैं ! 



    ANTARMAN


Wednesday, January 8, 2020

virah vedna



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विरह वेदना ,,,,,


कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन  की पिपासा ,,,,
कितने अश्रु  दृगों मैं ,
पलकें बिछाएँ करते इंतजार ,
हृदय घिरा घनघौर तिमिरमय ,
तिमिरमय मेरा संसार तुम बिन ,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन  की पिपासा ,,,,,

भर जाता हृदय मैं उन्माद सा ,
घुल जाता होंठों मैं बिषाद सा ,
कितनी विरह ,   कितनी वेदना,
  कितनी मिलन की पिपासा  ,,,,,

आंखें पथरीली हो गईं ,
पलकें हुई निर्झरिणी ,
पीड़ा कुछ कम  न हुई ,
हृदय चितवन बिच्छिन्न हुआ ,
कलियाँ सारी मुर्झा गईं ,
छा जाता हृदय मैं विराग सा ,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,

नींद से सूनी पलकें ,
तेरी यादों की परछायीं ,
चिर उन्नींदी  मेरी निशाँ ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

विरह की यह वेदना ,
विरह का क्रंदन मेरा ,
एक करुण  भाव से ,
गूंजता उर मैं न जाने ,
मधुर स्वर अलापता ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

क्रंदन से आहत हृदय हुआ ,
तनिक भी आराम न ,
नीर भरा ,एक आह भरा ,
प्रतिपल, प्रतिक्षण मेरा  ,
अनुराग भी उन्माद सा ,
संगीत की लयमय अनुभूति ,
उन्माद भरी बेस्वाद सी ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,,

पलकों पर हैं पल रहे ,
स्वप्न प्रियतम से मिलन के ,
नैन थक थक चूर हुए ,
तेरा पथ निहार कर ,
चिर उन्माद उर  मैं समाया ,
कट गया  घनघोर तिमिर ,
आस जागी फिर मिलन की ,
प्यासी थी पपीहे की तरह ,
स्वाति की एक बूँद को ,
कितनी विरह ,कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,

नैन मगन हो गए ,
झर झर  बरसने लगे ,
दृगों से मोती !
पलकें सजी हैं व्रीड़ा के गहनों से ,
होंठों ने मुस्कुरा कर कहा ,
मेरा सर्वस्वा तो तुम ही हो ,बस तुम ही हो ,,,
कितनी विरह , कितनी वेदना ,
कितनी मिलन की पिपासा ,,,,,,,,


 VIRAH VEDNA



Friday, October 25, 2019

urza aur ershaya ,,,,

एक अच्छी ऊर्जा और इर्ष्या ,,,,,

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जब कोई ऊर्जा किसी ईर्ष्या से ,
बात करती है , तो कहती है की ,
उगते हुए सूरज के प्रकाश की ,
किरणों के प्रकीर्णन , को रोक पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,,,
थम भी जाएँ बारिशें ,घनघौर तो क्या ,
प्रचंड हवाओं की लहरों को क्षेण पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,
और जब इश्क़ हो मुसाफिर  को ,
मंज़िल से अपनी ,और पाना हो उसको ,
दिल मैं बारूद सा भरकर ,
निकला है मुसाफिर ,
इरादों मैं दहकते शोलों को ,
ठंडा कर पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,
कितनी भी अड़चनें डालेगा ,
मेरी राह मैं ,
मैं तो हूँ ,आवारा पंक्षी ,
उड़ जाऊँगा , इन बादलों से भी ऊपर ,
इन घनघौर हवाओं को भी ,
काट सकता हूँ ,
मेरा रास्ता मोड़ पाना ,
तेरे बस की बात नहीं ,,,,,



              EK ACHI URZA AUR ERSHYA

Tuesday, October 22, 2019

KAHANI NAARI KI ,,,,

कहानी नारी की ,,,,



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कहानी नारी की ,,
नारी के जीवन मैं रंग अनेक हैं ,
हर रंग से बनती एक खूबसूरत तस्वीर है ,,,,
मगर हर तस्वीर की एक अलग ही कहानी है ,
कहानी उसकी नादानी की ,
रोष , आक्रोश , या कभी उदासी मैं डूबी 
जवानी की ,,,
कहानी अम्बर को छूने की ,,
ललक आकाश मैं उड़ने की ,
तृष्णा अपने अस्तित्व को पाने की ,
जीवन मैं अपनी एक अलग ,
पहचान बनाने की ,,
कहानी अपने लिए लड़ने की ,
कहानी दूसरों के लिए  , अपने 
जीवन को न्यौछावर कर देने की ,
कहानी सबको अमृत देने की ,
और खुद घूँट घूँट विष के ,
प्याले पीने की ,,
कहानी पुरुषों के पैरों , रौंदे  जाने की ,
या अत्याचार के विरुद्ध , अपनी आवाज़ उठाने की ,
कहानी नारी के अस्तित्व को मिटाने की ,
या देवी रूप मैं पूजे जाने की ,,
सतयुग ,त्रेता ,द्वापर , कलयुग 
युगों - युगों से चली आ रही ,
कहानी नारी की , 
अपना आत्मसम्मान खोकर ,
हर बार परीक्षा देती आई  है,
सीता हो या पांचाली ,,,
कहानी नारी की ,, मगर 
अब इतिहास बदलेगा ,
और बदलेगी हर कहानी ,
अब और भी खूबसूरत होगी ,
उसकी तस्वीर निखरेगा हर रंग ,
सम्मान और स्वतंत्रता से ,
परिपूर्ण होगी अब ,
कहानी नारी की ,,,,,





Friday, October 18, 2019

JINKO PAHUNCHNA HOTA HAI ,,,,,

जिनको पहुँचना होता है ,,,,,,,,



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     जिनको पहुँचना होता है ,
     प्रकृति भी उन्हें ,रास्ता दिखाती है ,
     जिनको उड़ना होता है ,
    आसमां भी उनको गले से लगाता  है ,
    कैसे रोक सकते हो ,
   इन पंक्षियों को उड़ान से ,
   जबकि आसमां भी उनका है ,
   और रास्ता भी उनका है ,,,,,,


KHWAAB ,,,,,,

ख्वाब ,,,,,





कुछ ख्वाब मन मैं ही दबे रह गए थे ,
कुछ अरमां जो हम , उठते ,बैठते ,
चलते , फिरते  संजोते रहे ,,,
कुछ बातें जो जुवां  न कह सकी,
कुछ कहे अनकहे शब्दों को बेझिझक ,
वयां कर दिया ,,,,
कलम का ऐंसा सहारा मिला ,
की जुवां की भी जरुरत नहीं ,
कलम नें  ऐंसा संभाला हमें ,
पूरे राज कह डाले हमने ,
क्यों , होठों पर मुस्कराहट  न  थी ,
क्यों,  कदम भी स्तब्ध थे ,
अपने नाम  से , ऐंसा प्रेम था हमे ,
की ,जी करता है , क्या कर दूँ ,
तुझे पाने के लिए ,
एक पल के लिए भी ,
कदम न लड़खड़ाए ,
हाँ , कभी हीनता सी जरूर  ,
पनपी मन मैं ,
मगर , आज हम फिर चल पड़े ,
अपने सफर पर ,
आज मेरे क़दमों मैं रवानी है ,
मेरे ख्वाबों मैं , जान ,
और फिर खिल उठा मेरा मन ,
मेरे मन मैं ,बहार है ,
जो फिर पक्षियों की ही तरह ,
उड़ान भरने के लिए तैयार है ,,,,,,



       

Wednesday, October 16, 2019

NAARI HUN ABLA NAHIN ,,,,

नारी हूँ अबला  नहीं ,,,,




छोड़ आई मैं अपना घर आँगन ,
तेरा घर महकाने को ,
घर संसार बसाकर तेरा ,
तुझे ही सर्वस्व बनाया है ,
मगर ,,
नारी हूँ  अबला  नहीं ,
दुर्वल समझने की भूल न कर ,
शक्ति का स्वरुप हूँ ,
तिनका समझने की भूल न कर ,
क्या हो तुम क्यों इतना अभिमान ,
अपने पुरूषत्व  पर गुमान न कर ,
नारी का अपमान न कर ,
कैसे सोच लिया ये तुमने ,
यह तो होती है , अस्तित्वहीन ,
कभी भी रौंदा जा सकता है ,
नारी हूँ अबला नहीं ,
दुर्वल समझने की भूल न कर ,,,,,
हर क्षेत्र मैं अव्वल है , नारी ,
पूरा ब्रम्हाण्ड नारी की ,
ताकत से अवगत है ,
जमीं से लेकर आकाश तलक ,
नारी नें  परचम लहराया ,
और अपना लोहा मनवाया ,,
इतिहास गवाह है नारी के ,
करतब का , कभी सुना है,
रजिया ,मनु , और  दुर्गा की कहानी ,
नारी हूँ , अबला नहीं  ,
दुर्वल समझने की भूल न कर ,,,,,,,,,,



           NAARI HUN ABLA NAHIN



JEEVAN EK CHALCHITRA ,,,

जीवन एक चलचित्र ,,,




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 जीवन एक चलचित्र की भाँति  चल ही रहा है ,
इसकी घड़ी की सुई टिक - टिक करती हुई चल रही है ,
यह मेरे लिए थम ती ही नहीं !
शायद  मुझे ही इसके साथ चलना होगा ,
जीवन के इस संघर्ष , इस दौड़ धूप मैं ,
चार पैसे कमाने की मेरी जद्दोजहद ,
और चलचित्र के ही समान , किसी व्यक्ति के जीवन मैं ,
आते उतार चढ़ाव , जहाँ अपने अपने अस्तित्व के लिये ,
सभी संघर्ष मैं लगे हुए हैं ,
जीवन लगता है मानो ,एक मनोरंजन सा बन गया है ,
जिसमें आपका ,अभिनय कैसा है ,
यह , आपका भविष्य निर्धारित करता है ,
बहुत छोटी सी उम्र मैं , शायद ,
बहुत बड़ी बड़ी बातें कह दी ,
क्या करूँ उम्र तो कम  है ,
तजुर्बा , थोड़ा ज्यादा हो गया है ,,,,
                     

               जीवन एक चलचित्र 

" एक आग लगी थी सीने मैं , ज्वाला सी धधक उठी ,

  छोड़े जब शब्दों के बाण , तो मन की आग बुझी ''





              JEEVAN EK CHALCHITRA ,,,,

Monday, October 14, 2019

TIRASKAR

तिरस्कार ,,





नवल नैन , नवल अंक ,
नवल शीर , नवल नीर ,
नवल कंचन सी काया ,
ईश्वर रूपी नन्हीं सी जान ने ,
बेटी बनकर दुनियाँ मैं , 
तिरस्कार ही तो पाया ,
ऐंसी भी क्या तुझे घृणा ,
दुनियाँ  ही न देखने दी ,
गर्भ मैं ही मेरा अस्तित्व मिटाया ,
सृजन करो तुम बेटी का ,
क्यों तुम भूल गए ,
तुमको भी तो किसी ,
बेटी ने जन्मा है ,
क्या तुमको अपनी माता का भी, 
अस्तित्व मिटाना है ,
बेटी बनकर दुनियाँ मैं ,
तिरस्कार ही तो पाया है ,
छोड़ गई माँ , मेरी मुझको ,
जब तुमको मुझे ,अपने हृदय से लगाना था ,
अपनी पलकों की छाँव मैं सुलाना था ,
ऐंसे अनमोल पल की क्या तुम्हें नहीं थी चाह ,
छोड़ गई तुम मुझको सड़कों पे ,
दरिद्रता से आलम्बन  को ,
ऐंसा छुड़ाया दामन मुझसे ,
मुड़कर भी न देखा ,
इसमें मेरी क्या गलती हो गई ,
यह तो था तेरी किस्मत का लेखा ,
और शायद मेरे भी नसीब  मैं न था ,
तेरी गोद मैं सोना ,
कितने दिनों से भूखी हूँ ,
न कुछ पिया , न खाया है ,
न सर पर छत है मेरे , 
न माँ  बाप का साया है ,
बेटी बनकर दुनियाँ मैं ,
तिरस्कार ही तो पाया है ,,   



        TIRASKAR






PHAREBI NAINA NUN ,,[,LYRICS]

PHAREBI NAINA  NUN ,,,




PHAREBI NAINA NUN KOUN SAMJHABE ,,,
CHAIN JO PAUN TO, NIND UD JAABE,
AANKHEIN JO KHOLUN , TO TUN NAJAR AABE ,
KITNA BACHAUN MAIN NAIN MERE ,
NAINA PHAREBI ,TOSE LAD LAD JAABE , 
PHAREBI NAINA NUN KOUN SAMJHABE ,,,,,
GUJRA KARUN JO GALIYON SE TERI ,
PALKO KO MAIN APNI JHUKAUN ,
SAMNE TUN JO AAYE MERE,
TUJHSE MAIN NAJRAIN CHURAUN ,
LAD HI GAYE NAINA PHIR BHI TOSE ,
NAINON SE BHALA KOUN BACHABE ,
PHAREBI NAINA NUN KOUN SAMJHABE ,,,,




MAIN BARSHON SE RAAHI THA ,,, [LYRICS ]

MAIN BARSHON SE RAAHI THA ,,,




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MAIN BARSHON SE RAAHI THA ,
TERE ISHQ KI MANZIL KA ,
PHIR TERE DIL KI MEHPHIL MAIN ,,,,
TANHA KYON YE DIL THA ,
TERE SANG KOI LAMHA ,
NA MUJHKO HANSIL THA ,
MERI JAAN TUN HI BATA ,
KYA MAIN NA TERE KABIL THA ,
AB TUN JO AA MILI ,
MILI MUJHKO RAHAT SI,
MERE DIL KO AADAT HAI ,
EK TERI CHAHAT KI ,
TOOTI THI UMMIDEIN ,
JAB TUN KHOI THI ,
WOH KHOON KE AANSU THE ,
MERI AANKH JO ROI THI ,
PHIR KAANON MAIN GOONJI ,
WOH TERI AAHAT THI ,
MERE DIL KO AADAT HAI ,
EK TERI CHAHAT KI ,
MAIN BARSHON SE RAAHI THA ,
TERE ISHQ KI MANZIL KA ,
PHIR TERE DIL KI MEHPHIL MAIN,
TANHA KYON YE DIL THA ,,,,




                   MAIN BARSHON SE RAAHI THA [ HARSHITA RAJAK ]

kal phir wahi raat thi ,,,

कल फिर वही रात थी ,,,, कल फिर वही रात थी , वारिश तेज हो रही थी , नई नई मुलाक़ात थी , कल  रात थी , तुम मिले...